जब लॉकडाउन ने मुझे मेरे गांव तक पहुंचा दिया
30 जनवरी के आसपास हमारे देश में कोरोना का पहला केस आया। जान-बूझकर या फिर क्या मजबूरी में, हमारे पूरे देश में सरकार को लॉक डाउन करना पड़ा और इसके दौरान कई हजारों लोगों की नौकरियां उनसे छूट गईं, कितने सारे लोगों की जानें चली गईं। ऐसे समय जब हम सभी घर में बंद थे और बाहरी दुनिया से संपर्क करना मुश्किल था, तो सिर्फ जिंदा रहना और बेसिक में से बेसिक necessities को पूरा करना ही सबसे ज्यादा जरूरी लगने लगा था। लेकिन हमारी कंपनी में ऐसा नहीं हुआ। बाकी companies की तरह लोगों को नौकरी से नहीं निकाला। मुश्किलें तो हमारे सामने भी थीं, लेकिन हमारे यहां लोगों को नौकरी पर रखा गया ताकि उनकी basic पैसे की जरूरतें पूरी हो सकें और कम से कम कोई अपनी नौकरी की वजह से जिंदगी में तकलीफ ना उठा पाए। एक ऐसा समय था जब नौकरी बची रहना ही एक बड़ा वरदान था।
और ऐसे समय पर अगर मैं 2 साल पहले, जब मैं इंजीनियरिंग के अपने आखिरी दौर में था, कोई मुझसे पूछता कि क्या तुमको ऐसी नौकरी मिलेगी जहां पर तुम काम भी कर सकोगे और अपने जन्म स्थान गांव में जाकर वहां की वादियों का आनंद भी ले सकोगे और साथ-साथ अपने गांव में जाकर लोगों से मिलोगे, गांव की हरियाली देखोगे, तो शायद मैं उसको कहता कि यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोच सकता। लेकिन ऐसी बातें होती हैं।
लेकिन जैसा कि मैंने कहा, जिंदगी में मुश्किल आती है तो उस मुश्किल को हल करने के लिए बहुत सारे रास्ते भी खुल जाते हैं। और ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ। अप्रैल, मई-जून के महीनों में मैंने मुंबई से ही work-from-home करते हुए काम किया। एक छोटे से घर में रहकर रोज दिन भर काम करता था। वहां पर जिंदगी बहुत ही मुश्किल होने लगी थी क्योंकि लोग कहते हैं किसी को जेल में क्यों भेजा जाता है? कि जेल में आदमी अकेला रहता है और अकेलापन आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। अकेला आदमी कुछ भी सोच सकता है और कुछ भी गलत काम कर सकता है जो उसके लिए बहुत ही घातक साबित हो सकता है, लेकिन क्योंकि वह आदमी अकेला है तो उसे पता नहीं चलता है।
ऐसे समय पर मैंने एक फैसला लिया कि गांव जाता हूं, गांव से काम करूंगा। कोशिश करूंगा। गांव में जहां हमारे यहां 24 घंटे बिजली नहीं रहती है, broadband services भी घर तक नहीं पहुंचती हैं, तो मैं ऐसा भी कह सकता हूं कि यहां पर internet की अच्छी सुविधा नहीं है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने सोचा, चलो risk लेते हैं और गांव जाता हूं। देखता हूं, अगर कुछ नहीं हुआ तो 1 हफ्ते में वापस आ जाऊंगा और फिर से मुंबई से काम करना शुरू कर दूंगा।
लेकिन कहते हैं कि जिंदगी में कल क्या होगा, किसी को पता नहीं। जिंदगी एक ऐसी अनसुलझी पहेली है जिसका उत्तर पहले पूछने वाले को भी पता नहीं है। तो फिर क्या होना था, मैंने जून महीने के आखिरी में ट्रेन पकड़ी और गांव आ गया और 1 जुलाई से गांव से काम करना शुरू कर दिया।
इसके लिए हमें कुछ इंतजाम करने पड़े। जैसे पुराना inverter लिया, तो बिजली की समस्या खत्म हो गई। फिर मैंने Jio के work-from-home plans subscribe किए, जिससे कि मेरा काम शुरू हो गया। बेहतरीन ना ही सही, लेकिन जितनी जरूरत थी उतनी speed मिलती थी, तो काम हो गया।
पहले कुछ दिन लगा कि यह शायद आगे नहीं हो पाएगा। मतलब कि काम तो मैं कर लूंगा, लेकिन यह जो सपनों की दुनिया देख रहा हूं, सर, हकीकत नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे आदत पड़ने लगी।
और मैं, जो कभी गांव आता नहीं था, जिसने शायद गांव में रहकर कोई भी त्यौहार पिछले 20 सालों में नहीं मनाया था, आज मैं जुलाई महीने में आया। जब मैं 5 साल से कम उम्र का था तब यहां रहा होगा, लेकिन तब की यादें अब नहीं थीं। जुलाई के बाद यहां पर कृष्ण जन्माष्टमी, 15 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस, अगले महीने में दशहरा, दिवाली और सबसे बेहतरीन गांव की बारिश का आनंद कीचड़ में कबड्डी खेलना, तालाब में नहाना ऐसी चीजें जो मैं शायद सोच भी नहीं सकता था कि ऐसी चीजें मुझे यहां करने का मौका मिलेगा। गांव में एक भी त्यौहार नहीं मना पाता था, इस बार मैंने लगभग सारे त्यौहार अपने गांव में मना लिए हैं।
सुबह 4:00 बजे उठना और फिर साइकिल से 10 से 15 किलोमीटर रोज। मुंबई जैसे शहर से आना, यहां हर रोज मेट्रो का काम चलता रहता था, सड़क पर दौड़ के अलावा कोई और चीज दिखाई नहीं देती थी। और यहां गांव में सुबह एकदम साफ हवा मिलती थी। चारों तरफ हरियाली, शांति और अपने लोगों के बीच रहने का मौका ये सब मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था।
शायद यही इस पूरी कहानी की सबसे खूबसूरत बात थी। जिस समय पूरी दुनिया के लिए कोरोना एक बहुत बड़ी परेशानी और डर का कारण बना हुआ था, उसी समय मेरे लिए इस मुश्किल ने एक ऐसा रास्ता खोल दिया, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। मुझे अपने गांव से काम करने का मौका मिला और उन चीजों को फिर से जीने का मौका मिला, जिन्हें मैं शायद जिंदगी की भागदौड़ में कहीं पीछे छोड़ चुका था।